gathiya jodo ka dard ka karan lakshan aur ilaj

गठिया या जोड़ों का दर्द का प्रकार, कारण, लक्षण और इलाज

Posted on

गठिया एक ऐसी बीमारी है जिससे पीड़ित रोगी के जोड़ों में असहनीय दर्द होने लगता है और यह दर्द सदियों तक कायम रहता ही। गठिया का इलाज करने के लिए आपको सबसे पहले इसके प्रकार और कारण को पता करना होगा।

गठिया (वात रोग) के प्रकार 

गठिया रोग को वात रक्त रोग के नाम से भी जाना जाता है।वात रक्त रोग एक बेहद ही कष्टदायक रोग है। इस बीमारी में रोगी को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वात-रक्त (जोड़ों का रोग) दो प्रकार के होते हैं:

उतान वात-रक्त

यह विकार त्वचा और मांस में होता है। इसमें खुजली, जलन, पीड़ा, फडकन और त्वचा में लाली जैसे लक्षण मिलते हैं।

गंभीर वात-रक्त

यह विकार संधि,(जोड़) तथा मज्जा में होता है। इस रोग में असहनीय दर्द और जकदन उत्पन्न होती है। संधिगत एंड तेंधे पद जाते हैं। कभी- कभी लंगड़ापन और पंगुता भी आ जाती है।

वात रक्त (गठिया रोग) होने के कारण

  1. वात और रक्त के एक साथ या अलग-अलग कुपित होने से वात रक्त रोग होता है।
  2. नाजुक स्वाभाव के मोटे और साधन संपन्न उन व्यक्तियों को वात रक्त रोग का खतरा अधिक रहता है, जो रात में जागते हैं और दिन में सोते हैं।
  3. लगातार लम्बे समय तक पाँव लटकाकर बैठे रहने से भी गठिया की समस्या हो सकती है।
  4. नमकीन, खट्टे, चटपटे, खारी, चिकने गर्म पदार्थ, शराब, सिरका, दही, गन्ना, मांस, सेम की सब्जी, उड़द, कुल्थी और मूली का अधिक प्रयोग करने से भी यह रोग होता है।
  5.  अरुचि-अपच की समस्या में जबरदस्ती भोजन करने से, सड़े-गले और जल जंतु या मांस खाने से भी यह रोग होता है।
  6. पसीने से भीगे शरीर में ठंडी हवा लग जाने से भी यह रोग हो जाता है। शीत प्रधान या ठंडी जगह पर रहने से भी यह रोग होने की संभावना है।

वात रक्त (गठिया) शुरू होने के लक्षण

गठिया अपना पहला आक्रमण रात्रि के समय में करता है। रोगी बेखबर आराम से सोया हुआ होता है तभी अचानक हाथ पैर के अंगूठे में तेज दर्द होने से उसकी आंखें खुल जाती हैं और सुबह होते होते दर्द कम होता जाता है। अंगूठे के अगले भाग की गांठ पर रोग का आक्रमण अधिक होता है और फिर एड़ी गल्फ संधि, घुटने आदि में फैल जाता है। पुरुषों में यह रोग स्त्रियों से अधिक होता है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का पाचन संस्थान खराब हो जाता है। पेट फूलना, पेट में गैस बनना, अम्ल बनना, भूख ना लगना और कब्ज रहना आज शिकायतें उसे सदा बनी रहती हैं। मूत्र कम मात्रा में आता है और यूरेटर की मौजूदगी के कारण मूत्र का रंग नीला हो जाता है।

  1. अनिद्रा की शिकायत रहती है। रोग ग्रस्त भाग में गर्मी और जलन रहती है।
  2. जोड़ों में दर्द सूजन और लालिमा रहती है। पसीने से एक अजीब से दुर्गंध आती है।
  3. जोड़ के बाद दूसरा एवं दूसरे के बाद तीसरा और अन्य जोड़ भी प्रभावित होते चले जाते हैं। यह वात रक्त का प्रमुख लक्षण है।
  4. जमीन में रोगी के पेशाब के सूखने पर लाल रंग की फतेह बन जाती है।
  5. उपचार होने पर रोगी बिल्कुल ठीक हो जाता है परंतु, अधिकांश रोगियों में इसका आक्रमण बार-बार होता है और धीरे-धीरे ऊपर की संधियाँ भी इस रोग से प्रभावित होती हैं।
  6. बार-बार इस रोग का आक्रमण होने पर जब यह पैरों के अतिरिक्त कलाई, कोहनी और हाथों के जोड़ों में भी हो जाता है तब यह जीर्ण वात रक्त (गठिया)  का रूप धारण कर लेता है। जो कि काफी खतरनाक होता है।
  7. शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलने लगता है।
  8. शरीर काला पड़ जाता है और स्पर्श करने पर त्वचा को कुछ पता नहीं चलता है। अर्थात, त्वचा की शक्ति समाप्त हो जाती है दर्द भी बहुत होता है।
  9. शरीर पर पिंडकाएं बन जाती हैं और उनमें असहनीय दर्द, फड़कन, भारीपन, खुजली, संधियों में विकृत या दर्द शुरू हो जाता है। त्वचा बदरंग पड़ जाती है और उस पर चकत्ते आ जाते हैं।

क्या है आधुनिक वात रक्त रोग (गठिया)

आधुनिक वातरक्त के विशेषज्ञ वात रक्त को गठिया के नाम से भी पुकारते हैं। रक्त में मिश्रित अम्ल के बढ़ जाने के कारण यह रोग होता है। सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति के 100 मिलीलीटर रक्त में मिश्रित अम्ल की मात्रा 34 मिलीग्राम रहती है। जब कभी भी प्यूरीन नामक प्रोटीन में दोष आ जाता है तो, रक्त में मिश्रित एसिड की मात्रा सामान्य से कहीं अधिक हो जाती है।

ऐसे में संधिशोथ तथा संघियों में सोडियम बाईयूरेट के जमा हो जाने के कारण इस रोग का जन्म होता है। इसके फल स्वरुप उच्च रक्तचाप, वृकाशमरी आदि रोगों की शिकायतें भी पैदा हो जाती है। सोडियम बाईयूरोट के संचय के कारण वतासय से मिलना इसका खास लक्षण है। यह वतासय पैरों की अंगुलियों, नेत्रपलक, वृक्क और स्वर यन्त्र यानी कान में पाए जाते हैं।

इसे भी पढ़ें- घुटनों का दर्द के 22 आसान इलाज

कैसे पता करें की गठिया रोग है

कान के बाहरी हिस्से में सोडियम बाईयूरेट  के संचय होने से इस रोग की संभावना सर्वाधिक होती है। खून का परीक्षण करने पर इ.एस.आर (e.s.r) एवं सफेद कणिकाओं की मात्रा बड़ी हुई मिलती है। हाथ की हड्डियों के पीले हो जाने पर भी इस रोग की संभावना बढ़ जाती है। खून में रक्त के संचालन में अम्ल का परीक्षण एक्सरे के करने पर जाना जा सकता है।

वात रक्त (गठिया) का औषधि उपचार, इलाज, उपाय और घरेलू नुस्खे

  1. गठिया का इलाज के मुख्य कारणों को दूर करने के लिए सावधानियां बरतें। किशोरावस्था में होने पर भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से करें।
  2. भोजन के बाद नींबू का चूर्ण 1 ग्राम, रस माणिक्य 125 मिलीग्राम, गुडूची का सत्व 500 मिलीग्राम 1 सप्ताह लेने से पूर्ण लाभ होता है।
  3. प्रभावित अंगों को औषधीय गुणों से युक्त तेल से मालिश करनी चाहिए।
  4. सरसों के तेल में कच्चे लहसुन की 10-12 कलियां काला होने तक पकाएं और इस दिल से प्रभावित अंगों की मालिश करें। मालिश करते समय तेल गुनगुना होना जरूरी है। इससे दर्द दूर होता है और इस समस्या से छुटकारा भी मिलता है।
  5. मल्ल भस्म, स्वर्ण भूपति रस, सवीर वटी, गोछुरादि गुग्गुल,  त्रयोदशांग गुग्गुल, बाकुचीकाद्य और चव्यकारिष्ट आदि सभी वात रक्त रोग की अच्छी आयुर्वेदिक औषधियां हैं लेकिन इन्हें कुशल वैद्य की देखरेख में ही लेना चाहिए।
  6. अरंडी के जड़ से निर्मित हुआ एक चम्मच चूर्ण सुबह-शाम लेने से गठिया का इलाज संभव है।इसके अलावा भी आप अरंडी के तेल से मालिश भी कर सकते हैं।
  7. अगर आप कच्ची लहसुन का सेवन करते हैं तो इससे गठिया से निजात आसानी से पाया जा सकता है।
  8. अदरक का लेप बनाकर जोड़ो पर लगाएँ। इससे आपके गठिया का दर्द दूर होगा और गठिया से राहत मिलेगी।
  9. एक बड़े नींबू और एक पाँव पानी के साथ जूस बनाए। इस जूस को रोजाना पिये। इससे भी गठिया रोग दूर होता है।
  10. बथुए के 100 ग्राम रस को नियमित रूप से सेवन करने से वाट रक्त की समस्या को काबू में किया जा सकता है।
  11. अगर आप लाल मिर्च का ज्यादा सेवन करते हैं तो इससे भी आपके गठिया का दर्द और रोग काबू में रहता है।
  12. एलोवेरा जूस को पीने से भी वात रोग कोषों दूर रहता है।
  13. मेथी के दो चम्मच चूर्ण को रोजाना एक गिलास गर्म पानी के साथ सुबह-शाम फाकने से भी गठिया का दर्द दूर होता है और धीरे-धीरे इसे प्रयोग में लाने से यह मूल रूप से दूर होता है।
  14. ब्रोकोली की सब्जी और अन्य हरी पत्तेदार सब्जियों को अपने आहार में शामिल करें। इससे भी वात रोग दूर होता है।

गठिया मरीज क्या खाएं और क्या नहीं खाएं

वातरक्त के रोगी के आहार को बहुत सोच समझकर चुनना चाहिए। वैद्य से यह जरूर पूछें कि रोगी का आहार कैसा होगा या उसके भोजन में क्या-क्या खाद्य सामग्री शामिल हो सकती है। किसी भी रोग में पथ्य-अपथ्य का बहुत ही महत्व होता है।

औषधियां रोगी का उपचार तभी करती हैं जब कुपथ्य से रोगी कोसो दूर हो। रोगी को प्रोटीन वाली वस्तुएं जैसे, पनीर, मांस-मछली आदि ना दे। मांस-मछली और अंडा रोगी पहले से ही खाता आ रहा हो तो उसके लिए यह खास हिदायत है कि, वह इस रोग से मुक्ति चाहता है तो पहले इस राक्षसी भोजन का त्याग करें।

प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ इसलिए वर्जित है क्योंकि, यह यूरिक एसिड बनाते हैं जो इस रोग का प्रमुख कारण है। पानी सभी रोगों की महाऔषधि है इसका पर्याप्त मात्रा में सेवन व्यक्ति को गंभीर रुप से बीमार नहीं होने देता है।

रोग के होने पर अधिक से अधिक मात्रा में पानी पियें। गुनगुना पानी पीना और भी अच्छा रहता है। रोगी को पुराना जौ, गेंहू, पुराना चावल, करेला, परवल, घी, मिश्री  देने से उपचार में मदद मिलती है। रोगी के लिए ऊपर बताए गए आहार सर्वश्रेष्ठ आहार है।

Gravatar Image
Lyfcure specifically shares important information related to pregnancy, periods and home remedies. Lyfcure has introduced a lot of pregnancy and health related information to the whole people in 2018 who belongs to india and reads hindi. we are mot popular in India as a health consultant.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *