सार्थक उपाध्याय की कुछ शायरियाँ

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सार्थक उपाध्याय

इससे पहले मैं कुछ शुरू करूं, मेरे बारे में आप थोड़ा जान लीजिये| 

” मैं घुमक्कड़ किसम का आदमी हूँ| आप मुझे आवारा कह सकते हैं, क्योंकि आवारगी में मुझे कुछ ऐसे शब्द मिल जाते हैं जिन्हें खूबसूरती से सजाकर मैं आप तक कुछ शायरियाँ, पेश कर सका हूँ|

मैं कुछ इस तरह से शायरियों को गढ़ता हूँ, जो दिल के जख्मों पर मरहम लगा सके! मुझे भी इसकी जरूरत महसूस हुई थी|तब से दिल जो कहता है उतारता चला जाता हूँ..उतारता चला जाता हूँ|”

पहली शायरी

तेरी जुल्फें, वो हँसी, बेहया बातें, अक्सर रुला देती है मुझे…

अब तो बता दे ऐ जालिमा, मेरा कसूर क्या था?


दूसरी शायरी

मुहताज हूँ तेरे इश्क का जो तेरी तलब न मिट रही,

यकीनन मैंने कई मंजर देखें हैं जो मेरे इश्क के प्यासे हैं…

तीसरी शायरी

कर बैठे बेइंतिहा मोहब्बत हम आपसे,

हमें क्या पता था की आपसे दिल्लगी भी आती है|

चौथी शायरी

मेहरबानी करना चाहती है तो यार, एक बात बता दे,,

मुझसे दिल्लगी करने के बाद तेरा भी दिल लगता है क्या??

पाँचवी शायरी

सारी दुनिया बेईमान है 

माँ तेरे कोख में सलामत हुआ करती थी!!

छठी शायरी

इश्क़ की इबादत करना हम भूल गए 

ये तब हुआ जब तुम हमें छोड़ कर चले गए!!

सातवी शायरी

बेतहाशा मुहब्बत करते हैं हम आपसे,

लेकिन, यार तुम्हारे लिए जान देने का तजुर्बा अभी हमारे पास नहीं है!!

आठवी शायरी

जो देखता हूँ वही लिखने का आदी हूँ,,

मैं अपने दौर का सबसे बड़ा फसादी हूँ!